Wednesday, February 5, 2020
Monday, July 8, 2019
पुलिस सबकी पुलिस का कौन ?
उल्लेखनीय है कि देश की सबसे बड़ी सिविल पुलिस के पास 82 साल से अपना कोई मुख्यालय नहीं था। आज का दिन उप्र पुलिस के लिए बड़ा दिन है, जब उसे अपना मुख्यालय मिला है। करीब 40178 वर्ग मीटर में फैले पुलिस मुख्यालय भवन को सिग्नेचर बिल्डिंग का नाम दिया गया है। ऐसे में देश की आर्थिक,प्रसासनिक व न्यायिक व्यवस्था के लिए पुलिस रिफॉर्म का होना जरूरी।
पुलिस बल भारतीय पुलिस अधिनियम १८६१ के तहत ही कार्य कर रही है। पुलिस में राजनीतिक दखल इतना अधिक बढ़ गया है की पुलिस संवैधानिक कम राजनैतिक अधिक दिखाई देती है।लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कानून और राज्यव्यवस्था के सफल संचालन में पुलिस प्रशासन की सफल भूमिका होती है,मगर यह तभी सभव है जब पुलिस महकमे के सभी व्यक्ति अपने कर्तब्यों तथा अधिकारों को भली-भांति समझकर उनका उचित ढंग से निर्हवन करें।यह सच है कि पुलिस बलों को कानून के दायरे में रहकर ही कार्य करना परता है, मगर इन नियम कानून का पता क्या प्रत्येक पुलिसबल को हैं?,क्या पुलिस बल कार्य करने के लिए स्वतंत्र है?,क्या पुलिस समय के साथ अपडेट है ?,क्या पुलिस विभाग को और भी विभागों के अनुरूप सुख सुविधाएं प्राप्त है ?,ऐसे अनेकों प्रश्न है जो पिछले कई सालों से या कहे आज़ादी के बाद से ही बनें हुए है ,जिसका ७१ सालों में किसी भी सरकार ने सुध नही ली जबकि यही एक ऐसा विभाग है जिसपर पूरे सासन व्यवस्था को सुचारू रूप देने की जिम्मेदारी रहती है ।आम जनता की जिम्मेदारी जिसमें सुरक्षा ,राजस्व,प्राकृतिक आपदा ,आपसी सद्भाव आदि आदि विषयों की जिम्मेदारी ,नेताओं के जूते साफ करने(अपवाद) से लेकर उनके खाने ,पीने(अपवाद),सुरक्षा आदि की जिम्मेदारी ।देश के सुरक्षा की जिम्मेदारी बहुत सी ऐसी जिम्मेदारियां है जो पुलिस विभाग को दी गयी है ।जबकि सुविधा के रूप में पुलिस विभाग के लोगों को ८*८का रूम रहने के लिए ,जीवन यापन के लिए कांस्टेबल स्तर पर ५०२० का मूल व २१६००भत्ता सहित बेतन(अलग -अलग राज्यों में अलग -अलग बेतन हो सकता है) मिलता है अब उसमें एक परिवार खायेगा क्या निचोड़ेगा क्या ।सासन द्वारा पुलिस विभाग को भ्रस्टाचार करने के लिए मज़बूर किया जाता रहा है जिसको हम भलीभांति समझ सकते है ।उदाहरण के रूप में ले तो उत्तर प्रदेश के पुलिसकर्मियों की कम संख्या का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश में 1192 नागरिकों की आबादी पर एक पुलिसकर्मी है जबकि मंत्रालय द्वारा 596 की आबादी पर एक पुलिसकर्मी को नियुक्त करने के आदेश है। इन्स्पेक्टर और सब इंस्पेक्टरों की भारी कमी हत्याओं और अन्य अपराधों के न ख़त्म होने वाले दौर के बीच प्रदेश पुलिस के ताजा आंकड़े चौंकाते है। प्रदेश के शहरी इलाकों में थानों की संख्या ग्रामीण इलाकों में थानों की संख्या से आधी से भी कम है। वर्ष 2016 जनवरी तक उत्तर प्रदेश में कुल 1528 थाने थे जिनमे 1023 थाने ग्रामीण इलाकों में और 440 थाने शहरी इलाकों में थे ,आईपीएस, पीपीएस रैंक के अधिकारियों से इतर प्रदेश पुलिस के पास सब इन्स्पेक्टर रैंक के स्वीकृत 19,545 पदों के सापेक्ष केवल 16,440 सब इन्स्पेक्टर हैं,वही 2753 इंस्पेक्टरों के सापेक्ष महज 1899 पद ही भरे हुए हैं। दुखद यह है कि इंटेलिजेंस विभाग में अपर पुलिस अधीक्षक रैंक के 59 पदों की स्वीकृति है लेकिन केवल 34 पद ही भरे जा सके हैं।
संख्या बल की कमी से जूझ रहा एसटीएफ मौजूदा स्थिति में यूपी एसटीएफ भी संख्या बल की भारी कमी से जूझ रही है। सीधे कहा जाए तो हाल है उससे साफ़ कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश आतंकी घटनाओं से मुकाबले के लिए भी कत्तई तैयार नहीं दिखता है। यूपी एसटीऍफ़ में एडिशनल एसपी रैंक के 19 पदों के सापेक्ष महज 8 पदों पर ही नियुक्तियां हुई हैं। एसटीऍफ़ में कुल स्वीकृत 417 पदों की संख्या के सापेक्ष 265 पदों पर ही भर्तियाँ हुई है। गौरतलब है कि प्रदेश में 2014-15 के दौरान तक़रीबन 37 हजार पुलिसकर्मियों की भर्ती हुई है उसके बाद 2018 में भी पुलिस भर्ती हुई पर अभी भी प्रत्तेक थानों पर संख्या बल की बड़ी कमी है ।
पुलिसिंग सुविधाओं के नाम पर भी उत्तर प्रदेश के पुलिसकर्मियों को पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं है । गृह मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश के 45 से 47 फीसदी पुलिसकर्मी अपने परिवार को दी गई आवासीय सुविधा से खुश नहीं हैं। यह दिलचस्प आंकडा है कि लगभग पौने दो लाख पुलिसकर्मियों के सापेक्ष यूपी पुलिस के पास ,परिवार के साथ रहने के लिए बनाए आवासों की संख्या महज 66 हजार है। प्रदेश पुलिस की बदहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी प्रदेश में 78 पुलिस स्टेशन किराए के कार्यालय में चलते हैं प्रदेश में 51 पुलिस स्टेशन ऐसे हैं जहाँ फोन नहीं है ,17 पुलिस स्टेशन ऐसे हैं जहाँ वायरलेस नहीं है।ऐसे में कोई भी यह कहने में थोड़ा भी देर नही लगाता की पुलिस भ्रस्ट है ।इसके लिए सिर्फ पुलिस बल ही नहीं जिमेदार हैं बल्कि पूरा सरकारी तन्त्र जिम्मेदार हैं. हमारे लिए इससे अधिक शर्म कि बात क्या होगी कि आज भारत का पुलिस प्रशासन अंग्रेजों द्वारा बनाए गए सन १८६१ के पुलिस एक्ट से क्रियान्वित है ।पुलिस विभाग पर लगातार आरोप लगता रहा है कि पुलिस लोकतन्त्र की भावनाओ का सम्मान नही करती है,अंग्रेज़ो ने भारतीय क्रांतिकारियों पर नियंत्रण के लिए जो पुलिस तंत्र बनाया था आज भी पुलिस उसी पर चल रही है।
आज भारत को संवेदनहीन पुलिस चाहिए, रास्ट्रीय सुरक्षा तथा लोकतान्त्रिक मूल्यों को बनाए रखने वाली मानवीय पुलिस चाहिए।
माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से विनम्र अनुरोध है कि जब देश परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है जिसमें कई ऐतेहासिक निर्णय लिए जा चुके है तो ऐसे में लोकतंत्र के प्रसासनिक स्तम्भ का मूल अंग पुलिस विभाग का भी अवलोकन करते हुए मज़बूत व प्रभावी बनाने की दिशा में निर्णय लें जिससे देश की व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके ।लेखक(आशुतोष मिश्र) स्वतंत्र पत्रकार है जो कि पुलिस विभाग के स्थिति को सालों से अध्यन कर रहा है।
नेक इरादे से आर्थिक क्रांति का साहस, प्रतिफल शून्य नोटबंदी ।
8 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 8:15 बजे नोटबंदी की घोषणा की तो सारे भारत में भूकंप सा आ गया।मैं भी अपने भतीजी के जन्मदिन को सेलिब्रेेेट कर
रहा था तभी टीवी पर चल रहे न्यूज पर ध्यान गया। प्रधानमंत्री जी बोल रहे थे आज आधी रात से 500 और 1000 की नोट लीगल टेंडर नही रहेंगी।यह घोषणा तो कुछ लोगों के लिए युद्ध के ऐलान से भी घातक सिद्ध हुई। उनकी रातों की नींद उड़ गई। कुछ लोग होशोहवास खोते हुए जेवेलर्स के पास दौड़े व् उलटे-सीधे दामों में सोना खरीदने लगे।अगले दिन से ही बैंक व ए टी एम लोगों के स्थाई पते बन गए। लाइनें दिनों दिन भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या को दिखानें लगीं। सरकार भी कभी लोगों को राहत देने के लिए व कभी काला धन जमा करने वालों के लिए नए नए कानून बनाती दिखी। कभी बैंक व ए टी एम से पैसे निकलवाने की सीमा घटाना व बढ़ाना व कभी पुराने रुपयों को जमा करवानें के बारे में नियम में सख्ती करना या ढील देना।
दूसरी तरफ सरकार अपने इस निर्णय को सही साबित करने में लगी रही। कभी प्रधानमंत्री व उनकी टीम लोगों को इस नोटबंदी के फायदे गिनाने में लगे रहे कभी पचास दिन का समय मांगते नजर आये। लोगों के अंदर भी बहुत भाईचारा देखने को मिला। अमीर दोस्तों को उनके गरीब नाकारा दोस्त याद आये। अमीर रिश्तेदारों को अपने गरीब रिश्तेदारों के महत्व का एहसास होने लगा। अमीर बेटे की गरीब माँ का बैंक अकॉउंट जो की पिता की मौत के बाद मर चुका था अचानक जिन्दा हो गया। ऐसा लगा मानों पूरी मानवता जिन्दा हो गई।जनता में भी एक आस् जागी की शायद अब हमारे खाते में भी कोई 2 से 4 लाख जमा करने को दे देगा ,मोदी जी ने उसके पहले ही जन धन अकॉउंट ओपेन करवाया था तो लोगों को लगा की शायद मोदी जी जो काला धन पकड़े उसे जनधन अकॉउंट में ट्रान्सफर कर दे वैसे भी 2014 लोकसभा चुनाव के पहले मोदी 15 लाख का न्योता भी दे चुके थे ।
भारतीय जनता उस कड़कड़ाती ठंड में लाइनों में थी ,कुछ की उसी लाइनों में तबियत भी ख़राब हो रही थी ,कुछ की तो मौत भी हुई ,कुछ को तो पुलिस की लाठिया भी खानी पड़ी।इतना ही नही कुछ का जन्म भी उसी लाइनों में हो गया ।मंज़र ऐसा था कि लोग हलकान और परेशान थे ।पर ये वो लोग थे जो अपनी खून और पसीने से ,अपने पति के पॉकेट से एक एक रुपये को जोड़कर इकट्ठा किये थे ,जबकि वही दूसरी तरफ एक ऐसा समुदाय भी देश में था जो करोङो और अरबों का हेराफेरी कर रहा था ।कभी बैंक कर्मचारियों के माध्यम से तो कभी बड़े नेता जी के सहयोग से ।सरकार की मंशा के विपरीत भ्रष्टाचार का बोलबाला चलता रहा ,गरीब लाइनों में हलकान था तो वही पूँजीपति भ्रष्टाचारी लाल और पीले नोट को ग़ुलाबी करते रहे ।जिसका नतीजा रहा कि मोदी जी के बयानों का गुब्बारा पिचक कर रह गया जिसमें उन्होंने आतंकवादियों ,नाकक्सलियों ,भ्रस्तचारियों की कमर तोड़ने का मंशा पाल रखी थी ।
भारत की अर्थव्यवस्था समझने में कही न कही मोदी सरकार से बड़ी भूल हुई उन्हें इस बात का थोड़ा भी बोध नही था कि भारत में अर्थव्यवस्था के दो सिस्टम चलते है जो एक दूसरे के समान्तर है ।एक वो जो बैंकिंग प्रणाली से विशुद्ध रूप दूर है और एक वो जो बैंकिंग प्रणाली के अनुरूप चलते है ।जो बैंकिग प्रणाली में है उनका तो सरकार लेखा जोखा रख सकती है पर उनका लेख जोखा रख पाना मुश्किल है जो रोज कमाते और रोज खाते है जिनकी संख्या भी अधिक है ।इसी का नतीजा रहा की रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को न तो ये पता था कि देश में ब्लैक मनी कितनी थी और नोटबंदी में कितना रिटर्न हुई।
नोटबंदी से सबसे ज्यादा नुक़सान अगर किसी सेक्टर को हुआ तो वो था रीयल स्टेट सेक्टर जो की पूरी तरह से ध्वस्त होने के कगार पर आ कर खड़ा हो गया ।जिस सेक्टर में आज भी लेनदेन हद तक नगदी में होता हो वो भला नोटबंदी में इतना नगद धन कहा से लाते।छोटे मोटे विल्डरों का पूरा बिजनेस ही ब्लैक मनी पर व नगद लेनदेन पर टिका था ।जिसका नतीजा रहा की ऐसे विल्डर बाज़ार से ही ग़ायब हो गये ,जिसकी वजह से मज़दूरों को काम का लाला पड़ गया ।एक तरफ़ बैंको की लाइन दूसरी तरफ़ काम का न मिलना मज़दूरों के लिए नोटबंदी एक अभिशाप साबित हुई।
नोटबंदी से सबसे अधिक लाभ किसी सेक्टर को हुआ तो वह था मीडिया सेक्टर जहाँ हमेशा से ब्लैक मनी को संग्रहीत किया जाता रहा है ।एक तरफ़ जहाँ मीडिया का पॉवर दिखा कर सिस्टम में फेरबदल कर दिया जाता है वही अपनी पहुँच का फ़ायदा उठाते हुए नोटबंदी में भी मीडिया के लोग ब्लैक को व्हाइट करते और करवाते दिखे ।जिसके लिए कही न कही सरकार की भी सहमति थी।
नोटबंदी से एक बात साफ थी की सरकार की मंशा ग़लत नही थी ,सरकार का मानना था कि ज्यादा ब्लैकमनी 500 और 1000 के नोट के रूप में ही संग्रहीत की गयी होंगी ।जिसका उपयोग नक्सलवाद और आतंकवाद प्रयोजन में किया जाता होगा जो की सही भी था ।इसके साथ -साथ देश में इन बड़ी नोट का डुप्लीकेट नोट भी बाज़ार में उपलब्ध हो गयी थी ,जिसको खत्म करना भी जरूरी था जो की हद तक नष्ट करने में सरकार कामयाब हुई ।नोटबंदी के पहले सरकार यह आंकड़ा लगाने में भी असमर्थ थी की देश के ख़ज़ाने में कितना धन किस रूप में है ,जो कि नोटबंदी के बाद साफ हो गया।मोदी सरकार को इस बात का भी पता चल गया की हमारे देश का सिस्टम कैसा है ।सबसे बड़ी बात नोटबंदी से यह रहा कि ब्लैकमनी का संग्रहण करने वालों और भ्रष्ट लोगों को एक संदेश देने में सरकार जरूर कामयाब रही की कभी भी सरकार 8 नवम्बर दोहरा सकती है ।
यह पूरा लेख लेखक का अपना विचार है न कि किसी संस्था का आंकड़ा जिसको क्लेम किया जा सके।
लेखक
आशुतोष मिश्र (स्वतंत्र पत्रकार)
स्वयं सेवक (नालासोपारा पश्चिम)
Sunday, July 7, 2019
तीन तलाक़
तीन तलाक़
तीन तलाक़ को समझने से पहले हमें निक़ाह को समझना जरूरी है ।मुस्लिम समाज में कोई भी पुरुष किसी भी महिला के साथ तभी सम्बन्ध स्थापित कर सकता है, जब वह पुरुष उस महिला के साथ निक़ाह स्थापित करे । मुस्लिम समाज में निक़ाह के अपने क़ायदे कानून होते है, जिसको हम साधारण भाषा में समझौता कह सकते है।जिसमें पुरुष को निक़ाह से पहले समझौते के रूप में मेहर राशि देने की घोषणा करनी पड़ती और सम्बन्ध स्थापित होने से पहले उस मेहर की रक़म को चुकाना भी आवश्यक है ।जिसके बाद अपने वैवाहिक जीवन की जिम्मेदारियों को उठाने की कसम भी खानी पड़ती है।यहाँ तक की विधि विधान में पूरे देश की सहमति रही है ,जिसको लेकर क़ानून भी इजाज़त देता है।
परन्तु कुछ रूढ़िवादी ,विध्वंशक मुश्लिम समाज के कठमुल्लों की माने जो शरियत शब्द कोआगे करके अपनी मनमानी करते है ,जिनके अनुसार आगे चलकर यदि किसी आपसी वैचारिक मतभेद या फिर किसी भी कारणवश वह पुरुष अपनी पत्नी को किसी भी माध्यम से चाहे वो मोबाइल पर मैसेज भेज कर या फिर स्वयं तीन बार तलाक बोल कर या लिख कर, अपनी पत्नी को और स्वयं को उस वैवाहिक संबंध से किसी भी समय अलग कर सकता है। इसे ही तीन तलाक कहा जाता है यह तलाक़ पति पत्नी दोनों को मानना पड़ेगा।सवाल यहाँ यह उठता है कि जब निक़ाह एक समझौता है तो तलाक़ लेने का अधिकार किसी एक पक्ष को कैसे ?,जब निक़ाह के समय वकील ,पक्षकार ,समाज का रहना जरूरी तो तीन तलाक़ के समय किसी एक का फ़रमान मान्य कैसे?,वैवाहिक जीवन की जिम्मेदारी का कसम खाने वाला एक महिला को बिना उसके मर्ज़ी के लाचार बेवश कैसे छोड़ सकता है ?।कई ऐसे सवाल है जो तीन तलाक़ जैसे वहैयात फ़रमान को असंबैधानिक नही क़ानून विरोधी घोषित करते है।
वैसे तो देश को आज़ाद हुए 72वर्ष होने को है पर देश की एक बड़ी आवादी जो की 25 करोड़ के किसी समुदाय की अहम हिस्सा को लगातार हमारी सरकारें ,हमारा समाज नजरअंदाज करता रहा ।क्योंकि राजनैतिक पार्टियों को उस 25 करोड़ के समुदाय में अपना विशेष वोट बैंक दिखता रहा।पुरुष प्रधान मानसिकता महिलाओं का दोहन करती रही ।धार्मिक मुद्दा व शरीयत का उलाहना देते हुए कठमुल्लों ने अपनी हिटलर शाही लगातार उन बेवस ,लाचार महिलाओं पर थोपी ।जबकि समय -समय पर कुछ साहसी महिलाओं ने इसका विरोध भी किया जिसमें शाहबानों का मामला कभी तूल पकड़ा ,लगातार हमारे देश की न्यायलयों में इस कुरीति को क़ानून विरोधी भी सबित किया गया पर वोट की राजनीति और पुरुष प्रधान मानसिकता ने 2014 से पहले इस कुरीति के ख़िलाफ़ न तो किसी को खड़ा होने दिया और न ही इसे खत्म होने दिया ।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा था " जब जब होई धरम की हानि, बारहि असुर अधम अभिमानी, तब तक धर प्रभू विविध शरीरा, हरहि दयानिधि सच्जन पीड़ा"।समय था 2014 का जब नरेन्द्रमोदी की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार बनी । सरकार बनते ही कई प्रमुख मुद्दे देश के पटल रखे गए जिसमें तीन तलाक़ एक विशेष मुद्दा रहा।71 वर्षों में पहलीबार किसी सरकार ने मानवता और इस कुरीति की वजह से हो रहे अन्याय को समझा और इससे निज़ात के लिए देश के संविधान में क़ानून की आवश्यकता महशुस की जिसके बारे में देश के राजनैतिकों को वर्षों पहले सोचने की आवश्यकता थी ।
जब जागों तभी सवेरा को तर्ज रखते हुए मोदी सरकार ने दिसंबर 2017 में तीन तलाक़ को रोकने के क़ानून प्रस्तावित किया जिसमें तमाम प्रावधान किये ।प्रस्तावित कानून में एक बार में तीन तलाक या 'तलाक ए बिद्दत' पर लागू होगा और यह पीड़िता को अपने तथा नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांगने के लिए मजिस्ट्रेट से गुहार लगाने की शक्ति देगा. इसके तहत पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के संरक्षण का भी अनुरोध कर सकती है और मजिस्ट्रेट इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करेंगे.मसौदा कानून के तहत, किसी भी तरह का तीन तलाक (बोलकर, लिखकर या ईमेल, एसएमएस और व्हाट्सएप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से) गैरकानूनी होगा. मसौदा कानून के अनुसार, एक बार में तीन तलाक गैरकानूनी और शून्य होगा और ऐसा करने वाले पति को तीन साल के कारावास की सजा हो सकती है. यह गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध होगा. प्रस्तावित कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होना है.इसके तहत सज़ा का भी प्रावधान किया गया । एक बार फिर पुरुष प्रधान मानसिकता और राजनैतिक रोटी सेकने वाली मानसिकता आड़े आयी और समाज में जगह -जगह शरीयत की दुहाई देकर कुछ कठमुल्ले और राजनैतिकों ने विधवा विलाप करना शुरू कर दिया ।कुछ का कहना था कि ये क़ानून धर्म के ख़िलाफ़ है तो कुछ कहना था कि मोदी सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए क़ानून प्रस्तावित किया ।किसी कठमुल्ले ने ये नही कहा कि समाज के एक वर्ग के लिए यह क़ानून बहुत महत्वपूर्ण है।अगर कानून में कुछ खामियां थी जैसा की हो सकता है पर ये भी संभव था की भविष्य में उसे भी दुरुस्त किया जा सकता था।सुप्रीमकोर्ट ने भी अगस्त 2017 में तीन तलाक़ को अवैधानिक घोषित कर दिया था ।ऐसे में मोदी सरकार ने सितंबर 2018 में तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ अध्यादेश लाकर यह साफ़ कर दिया कि उसकी मानसिकता साफ़ है, जिसको सीतकलीन सत्र दिसंबर 2018 में संसद के दोनों सदनों से पास कराने कि चुनौती थी ।लोकसभा में तो क़ानून पास हो गया पर राज्यसभा में अटक गया।
अब जबकि 2019 में एक बार पुनः मोदी सरकार प्रचंड बहुमत से सरकार में आ चुकी है तो उसकी ज़िम्मेदारी इस कुरीति पर अंकुश लगाने की दोगुनी हो जाती है ।जिससे समाज का बड़ा हिस्सा सम्मान से अपना जीवन यापन कर सके।
लेखक
आशुतोष मिश्र (स्वतंत्र पत्रकार)
स्वयं सेवक (यशवंत गौरव नालासोपारा पश्चिम)
Saturday, March 16, 2019
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Monday, January 23, 2017
जौनपुर 366 सदर विधानसभा का चुनावी अध्यन व् विश्लेषण ।आदि गंगा गोमती के गोद में बसा शहर जौनपुर जिसका इतिहास के पन्नों में भारत की राजधानी के रूप में उल्लेख किया गया है ।ज्यादा इतिहास में न जाते हुए वर्तमान की बात करते है और आप लोगों को कुछ आंकड़ों के माध्यम से यहाँ की वर्तमान राजनितिक परिदृश्य को रखने का प्रयास करता हूँ।जौनपुर में 9 विधानसभा और 2 लोकसभा (जौनपुर,मछलीशहर)है ।
2012 विधानसभा चुनाव में एक -एक सीट बीजेपी और कांग्रेस को और बाकि समाजवादी पार्टी को मिली थी ।जौनपुर 366 सदर विधान सभा कांग्रेस के खाते में गयी थी जिसको कांग्रेस के नदीम जावेद ने अपने प्रतिद्वंदी तेजबहादुर मौर्या (पप्पू)को 1239 वोटों से पराजित करते हुए 50863 लोगों का दिल जीता था ।2012 में मुलायम और अखिलेश यादव का बोलबाला माना जा रहा था पर सदर विधान सभा में हवा ऐसी बही की कांग्रेस को विजयश्री मिली।
जौनपुर सदर विधानसभा में पिछले कई वर्षों से एक खास धर्म के लोग ही विधायक चुने जाते है जिसमे बीजेपी के सुरेंद्र प्रताप सिंह एक अपवाद रहे जो 2002 में विजय श्री प्राप्त कर सके ।
अब हम आपको 2012 सदर 366 विधानसभा चुनाव के कुछ खास आंकड़े प्रस्तुत करता हूँ।
प्रत्याशी प्राप्तमत मतप्रतिशत
नदीम जावेद (कांग्रेस) 50,863 25.5
तेज बहादुर मौर्य(बसपा) 49,624 24.8
जावेद अंसारी (सपा) 47,724 23.9
सुरेंद्र प्रताप सिंह(बीजेपी) 30,948 15.5
अब हम बूथ के आंकड़े देखते है ।जीते हुए प्रत्याशी का
जीते हुए बूथ मजबूत बूथ औसत बूथ कमजोर बूथ
122 33 105 225
कुल मतों की संख्या है 4,32,192 जिसमें महिला और पुरुषों के उम्र के हिसाब से आंकड़ा इस प्रकार है।
वर्षों 18-24 25-34 35-44 45-54 55-64
पुरुष -41,199 77,535 49,812 34,998 20,159
9.5% 17.9% 11.5% 8.1% 4.1%
महिला-26,824 58,254 43,111 31,892 18,439
6.2% 13.5% 10% 7.4% 4%
अगर कुल महिला और पुरुषों की संख्या देखी जाय तो इस प्रकार होगा -
महिला -1,93,768
पुरुष- 2,38,404
कुछ मतदाता न पुरुष है न ही महिला जिनकी संख्या न के बराबर है ।जाती और धर्म आधारित आंकड़ा प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है क्योंकि चुनाव आयोग और सुप्रीमकोर्ट की ऐसी ही मंशा है ।उत्तर प्रदेश का चुनाव हो और जाती धर्म की बात न हो ये बड़ा ही मुश्किल है पर कोशिश जारी है ।
पिछले चुनावों में जाती के आधार पर आंकड़े प्रस्तुत किये जाते रहे है, जिसमें समाजवादी पार्टी के खाते में यादव और मुस्लिम वोटों को देखा जाता रहा है, खासकर उत्तर प्रदेश में। जिसे M Y फैक्टर भी कहा जाता था पर वो तब की बात है जब समाजवादी पार्टी के मुखिया और राष्टीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव हुआ करते थे, पर आज समाजवादी पार्टी के मुखिया और अध्यक्ष अखिलेश यादव है ।अखिलेश यादव अपनी पुरानी परंपरा से ऊपर उठकर विकास की बात करने की बात कह रहे है ।वही दलित वोट मायावती यानि बहुजन समाज पार्टी के माने जाते रहे है जबकि कांग्रेस में ब्राह्मण स्वर्ण और कुछ मुश्लिम वोटों को गिना जाता रहा है ।जबसे बीजेपी के खेवन हार मोदी जी हुए है ,तब से बीजेपी के वोटों में बड़ी बढत देखि गयी है जिसमें स्वर्ण,अन्य पिछड़े,जाटव वोट माना जाता रहा है ।
पिछले 2012 विधानसभा और 2014 लोकसभा को ध्यान में रखकर बात करे तो जौनपुर की जनता कुछ हदतक पारंपरिक वोटों को धता बताते हुए विकास को तरजीह देते हुए देखि गयी है जिसमें युवावों का अहम् योगदान रहा है ।2012 में 366 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नदीम जावेद ने विकास की बात करते हुए अनेक वादे किए थे जिसे उस समय में क्षेत्र के युवावों ने सराखों पर रखते हुए उन्हें विधायक बना दिया था।बताते है कि नदीम के चुनाव में 15-40 वर्ष के युवावों ने कमान सम्हाल रखी थी ,जिनके पीछे नदीम ने पानी की तरह पैसे उड़ाये थे ।200-300 गाड़िया प्रति दिन प्रचार के लिए निकलती थी ।रहने के लिए होटल और खाने पीने की पूरी व्यवस्था होती थी ,उसीका नतीजा था कि कांग्रेस के पारंपरिक 5 हजार वोट को 50 हजार में बदल दिया गया ।2014 लोकसभा चुनाव में जौनपुर की जनता ने पूरे देश की तरह मोदी जी की विकासवादी आंधी में बह गयी थी ,जिसमें जिले से दो युवा चेहरों को चुन कर देश की संसद में पंहुचा दिया (कृष्ण प्रताप सिंह जौनपुर )(रामचरित्रनिषादमछलीशहर)।
2017 जौनपुर 366 सदर विधानसभा के लिए वैसे तो अभी सभी पार्टियों के उम्मीदवार मैदान में नहीं आए है पर तस्वीर मतदाताओं के सामने जरूर दिखाई देने लगी है ।समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन के बाद जहा ज्यादा लोगों का मानना है कि ये सीट कांग्रेस के लिए समाजवादी पार्टी छोड़ देगी, वही मन ही मन कांग्रेसी और खुद नदीम जावेद अखिलेश यादव और राहुल गांधी को शुक्रिया अदा कर रहे है ।पिछले 2 सालों से लगातार तन मन धन से मेहनत कर रहे समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को जोर का झटका लगा है ।कहा जाता है कि जावेद सिद्दीकी ने अभी तक करोड़ों रूपये खर्च दिए है जिसमें गाड़ियों का काफिला ,पार्टी कार्यालय का खर्चा और पार्टी का चंदा रहा है।ऐसे में देखने की बात होगी की जावेद सिद्दीकी 2 साल मेहनत करने के बाद क्या ये सीट नदीम जावेद को गिफ्ट में दे देते है या निर्दल चुनाव मैदान में उतरकर ताल से ताल बजाते है ।बीजेपी अभी भी इस ताक में बैठी है कि सपा कांग्रेस गठबंधन से कौन उतरता है फिर जाकर वो अपना पत्ता खोले ।
2017 उत्तर प्रदेश चुनाव जहा अखिलेश यादव और नरेंद्र मोदी के इज्जत का सवाल बनता जा रहा है वही 2019 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल भी माना जा रहा है ।जहाँ केंद्र की भाजपा सरकार मोदी के अगुवाई में विधानसभा चुनाव में विकास मॉडल पेश करती हुई दिखाई दे रही है जिसमें शौचालय ,गैस सिलेंडर ,स्वच्छ भारत ,डिज़िटल इंडिया,नोटबंदी को लेकर जा रही है ।वही बीजेपी पार्टी व् उसकी सहयोगी आरएसएस और अन्य हिन्दू पार्टिया धर्म को मुद्दा बनाने में परहेज करती नहीं दिखाई दे रही है ।अखिलेश यादव एक्सप्रेस वे ,मेट्रो,पुलिस 100,महिला हेल्प लाइनऔर एम्बुलेंस को लेकर मैदान में दिखाई दे रहे है ।जिनके साथ कांग्रेस का धब्बा भी साथ- साथ है ।
2017 के चुनाव में धर्म आधार न बना तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिलने के आसार वही धर्म आधार बना तो बीजेपी होगी प्रदेश की पहली पसंद ।
Tuesday, January 17, 2017
उल्लू न बनाओ नेता जी ..
उत्तर प्रदेश 2017 विधान सभा चुनाव आते ही एक बार फिर नेता जी और राजनितिक पार्टियां अपना अपना चाल चलना शुरू दी है ।पिछले कई महीनों से समाजवादी पार्टी की पारिवारिक कलह जनता और चुनाव आयोग के सामने थी ,जिसमे बाप बेटे की बीच दंगल चल रहा था । एन मौके पर यानि नामांकन से ठीक पहले दंगल का परिणाम आया और योद्धा अखिलेश बेटा जी घोषित हुए ।पूरी की पूरी सायकिल और पार्टी की कमान मिल गयी ।पार्टी कार्यकर्ता जो इधर उधर या शांत थे उनको एन मौके पर चार्ज कर दिया गया ।पिता जी यानि मुलायम सिंह यादव जी भी बेटे के अनुसार चलने को तैयार हो गए जो पिछले दिनों बेटे को कोसते फिर रहे थे ,चाचा जी भी चुनाव में साथ दिखने लगेंगे ये पक्का है क्योंकि स्क्रिप्ट ही ऐसी लिखी गयी थी ।
बात कांग्रेस की करें तो 27 साल यूपी बेहाल का नारा लेकर घूमने वाली पार्टी अब उन्ही 27 साल का बखान करते दिखेगी ,क्योकि गठबंधन में रहना है तो अखिलेश बाबा की जय कहना है।उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन खो चुकी कांग्रेस पिछले साल से ही अपनी ताकत आजमाइस करती दिख रही थी कभी खटिया लेकर तो कभी 27 साल यूपी बेहाल का नारा लेकर पर आखिर में औकात का पता चल गया कि प्रशांत किशोर हो या पप्पू राहुल कोई भी दहाई का आंकड़ा पार नहीं करवा सकता ।साइकील के कैरियर पर बैठ कर अपनी नैया पार करने की जुगत में है कांग्रेसी ।
मायावती जी की बात करें तो, वैसे वो दलित चिंतक है पर चुनाव के समय मुस्लिम और स्वर्ण चिंतक बन जाती है ।मायावती जी अपने उम्मीदवारों की लिस्ट में मुस्लिम और स्वर्ण कार्ड को तरजीह दी है ।अब उन्हें दलितों के चिंता नहीं होगी क्योकि अगर दलितों टिकेट देती तो सीट तो जाती ही ऊपर से कोई और दलित नेता उनके टक्कर में आ जाता ।वैसे भी ईंट पत्थर से उत्तरप्रदेश की जनता अभी उबर नहीं पायी है तो इस बार माहौल तो ठंडा ही रहने वाला है ।
मोदी जाप करने वाली पार्टी भी अब राम मंदिर ,परिवार वाद ,तोड़ जोड़ और धर्म की बात करने से गुरेज नहीं कर रही है ।कुछ भी हो उत्तरप्रदेश में अस्तित्व तो बनाना ही पड़ेगा क्योंकि हमेशा कांग्रेस के प्रति जनता में गुस्सा थोड़ी न रहेगा कि लोकसभा फतह कर लेंगे और लोकसभा फ़तह करना है तो उत्तर प्रदेश को अपना बनाना होगा जरिया चाहे जो भी हो ।
उत्तर प्रदेश जहाँ बच्चा बड़ा होकर पहले मैथ ,इंग्लिश और साइंस नहीं पड़ता बल्कि राजनीति शास्त्र जरूर पड़ता है वो भी स्कूल से नहीं घर से लेकर चौक चौराहों पर ।ऐसे जनता को समाजवादी नेता पारिवारिक दंगल दिखा कर, कांग्रेस के पारंपरिक वोटों को मिलाकर राज सिंहासन चाहते है पर जनता उन दिनों को कैसे भूल जायेगी जो नेता जी (मुलायम) ने अखिलेश के लिए कहा कि अखिलेश मुस्लिम विरोधी हो गए है ,कांग्रेस चिल्ला चिल्ला कर कह रही थी कि अखिलेश राज नहीं माफिया राज है यूपी की जनता बेहाल है ।मायावती का मुस्लिम कार्ड और स्वर्ण प्रेम दलित वोटरों को कितना भायेगा ये तो समय बतायेगा ।सभी पार्टियों के निशाने पर चल रही भाजपा क्या अपने तोड़ जोड़ और धर्म कार्ड को लेकर अपनी नैया पार कर पायेगी जबकि नोटबंदी की मुसीबत और कालाधन का एक भी रूपये जनता के हाथ नहीं लगा हो तो क्या मोदी जाप मोदी राज कर पायेगा ये तो आने वाला मार्च का महीना ही बताएगा ।
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